इस्लामाबाद सिंधु नदी जल बटवारें को लेकर हुए समझौते को आज 60 साल पूरे हो गए हैं। 19 सितंबर 1960 को हुए इस समझौते में भारत और पाकिस्तान के बीच विश्व बैंक ने मध्यस्थता की भूमिका निभाई थी। इस समझौते को दुनिया में अक्सर शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की संभावनाओं के उदाहरण के रूप में पेश किया जाता है। हालांकि, यह बात भी किसी से छिपी नहीं है कि सिंधु जल समझौते को लेकर भारत और पाकिस्तान के संबंध कई बार खराब भी हुए हैं। विश्व बैंक ने किया मध्यस्थता से इनकार अगस्त शुरुआत में ही विश्व बैंक ने पाकिस्तान को तगड़ा झटका देते हुए इस विवाद में मध्यस्थता करने से इनकार कर दिया था। वर्ल्ड बैंक ने पाकिस्तान को दो टूक लहजे में कहा था कि दोनों देशों को किसी तटस्थ विशेषज्ञ या न्यायालय मध्यस्थता की नियुक्ति पर विचार करना चाहिए। इस विवाद में हम कुछ नहीं कर सकते हैं। पाकिस्तान ने विश्व बैंक से भारत के दो जल विद्युत परियोजनाओं को लेकर कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (सीओए) की नियुक्ति के लिए अनुरोध किया था। दोनों देशों में क्या है विवाद 1947 में आजादी मिलने के बाद से ही दोनों देशों में पानी को लेकर विवाद शुरू हो गया। दरअसल, सिंधु जल प्रणाली जिसमें सिंधु, झेलम, चिनाब,रावी, ब्यास और सतलज नदियां शामिल हैं ये भारत और पाकिस्तान दोनों देशों में बहती हैं। पाकिस्तान का आरोप है कि भारत इन नदियों पर बांध बनाकर पानी का दोहन करता है और उसके इलाके में पानी कम आने के कारण सूखे के हालात रहते हैं। विश्व बैंक की मध्यस्थता से हुआ था पानी को लेकर दोनों देशों के बीच विवाद जब ज्यादा बढ़ गया तब 1949 में अमेरिकी विशेषज्ञ और टेनसी वैली अथॉरिटी के पूर्व प्रमुख डेविड लिलियंथल ने इसे तकनीकी रूप से हल करने का सुझाव दिया। उनके राय देने दे बाद इस विवाद को हल करने के लिए सितंबर 1951 में विश्व बैंक के तत्कालीन अध्यक्ष यूजीन रॉबर्ट ब्लेक ने मध्यस्थता करने की बात स्वीकार कर ली। जिसके बाद 19 सितंबर, 1960 को भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल समझौता हुआ। जवाहरलाल नेहरू और अयूब खान ने किये हस्ताक्षर इस संधि पर भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति अयूब खान ने दस्तखत किए थे। 12 जनवरी 1961 से संधि की शर्तें लागू कर दी गईं थीं। संधि के तहत 6 नदियों के पानी का बंटवारा तय हुआ, जो भारत से पाकिस्तान जाती हैं। 6 नदियों के पानी का बंटवारा समझौते में स्पष्ट किया गया है कि पूर्वी क्षेत्र की तीनों नदियां- रावी, ब्यास और सतलज पर भारत का एकछत्र अधिकार है। वहीं, पश्चिमी क्षेत्र की नदियों- सिंधु, चिनाब और झेलम का कुछ पानी पाकिस्तान को भी देने का समझौता हुआ। भारत के पास इन नदियों के पानी से भी खेती, नौवहन और घरेलू इस्तेमाल का अधिकार है। साथ ही भारत डिजाइन और ऑपरेशन की निश्चित मापदंडों के अधीन पनबिजली परियोजनाएं तैयार कर सकता है। तीन नदियों के कुल 16.80 करोड़ एकड़ फीट पानी में से भारत के हिस्से 3.30 एकड़ पानी दिया गया है जो कुल पानी की मात्रा का करीब-करीब 20 प्रतिशत है। हालांकि, भारत अपने हिस्से का 93-94 प्रतिशत पानी ही इस्तेमाल करता रहा है। हर साल मिलते हैं दोनों देशों के आयुक्त सिंधु जल समझौते के तहत भारत और पाकिस्तान के बीच एक स्थाई आयोग का गठन किया गया था। सिंधु आयोग के दोनों तरफ के आयुक्त इस समझौते पर अपनी-अपनी सरकारों का प्रतिनिधित्व करते हैं। समझौते के तहत दोनों आयुक्तों को साल में एक बार मीटिंग करनी होती है- एक साल भारत में तो दूसरे साल पाकिस्तान में। मार्च महीने में सिंधु आयोग के आयुक्तों की मीटिंग होनी थी, लेकिन कोरोना संकट के कारण भारत ने इसे टालने का प्रस्ताव रखा। समझौते के तहत हर साल 31 मार्च को दोनों आयुक्तों की मीटिंग होती है। भारत के इन दो परियोजनाओं पर पाकिस्तान को आपत्ति पाकिस्तान को भारत के 330 मेगावॉट के किशनगंगा पनबिजली परियोजना और 850 मेगावॉट के रातले जलविद्युत परियोजना पर आपत्ति है। जबकि भारत का कहना है कि हम विश्व बैंक के नियमों के अनुसार जम्मू-कश्मीर के विकास के लिए इन परियोजनाओं को संचालित कर रहे हैं।
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