उम्र बढने के साथ साथ महिलाओं की फर्टिलिटी भी कम होती रहती है जिससे उनका कंसीव करना मुश्किल हो सकता है। अधिक उम्र में मां बनने पर जोखिम कारक और प्रेगनेंसी से जुडी जटिलताएं आ सकती हैं।विशेषज्ञों का कहना है कि 20 साल की उम्र के आखिरी वर्षों और 30 साल की उम्र के शुरुआती वर्षों में कंसीव करना सबसे सही रहता है। सही उम्र में मां बनने के फायदे मां और शिशु दोनों को मिलते हैं। एक अध्ययन में बताया गया है कि पहला बच्चा करने की सबसे सही उम्र साढे तीस साल होती है।
मां बनने के लिए उम्र के अलावा और भी कई बातें जरूरी होती हैं जैसे कि मानसिक और आर्थिक रूप से बच्चे के लिए तैयार होना। हर महिला के लिए यह समय अलग होता है।
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पूरे जीवन में महिलाओं के शरीर में लगभग 20 लाख एग बनते हैं और उम्र बढने के साथ एग बनने की संख्या में कमी आने लगती है। 37 की उम्र में केवल पच्चीस हजार एग रह जाते हैं जबकि 51 की उम्र में 1,000 एग बचते हैं। इन एग की क्वालिटी भी समय के साथ कम होती रहती है।
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और टयूबल डिजीज जैसी स्थितियों के विकास के कारण भी फर्टिलिटी पर नकारात्मक प्रभाव पड सकता है। उम्र बढने पर इनका खतरा भी बढता रहता है।
इन कारकों की वजह से फर्टिलिटी पॉवर 32 की उम्र तक कम होना शुरू हो जाती है। 3 और 37 की उम्र में फर्टिलिटी ज्यादा तेजी से गिरती है।
धूम्रपान, रेडिएशन और कीमोथेरेपी जैसी कैंसर की ट्रीटमेंट और पेल्विक इंफेक्शन जैसे कारक भी आपके प्रेगनेंट होने की संभावना को प्रभावित कर सकते हैं।
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कुछ महिलाएं शारीरिक रूप से मां बनने के लिए तैयार होती हैं लेकिन आर्थिक और भावनात्मक रूप से तैयार नहीं होती हैं। ऐसे में उन्हें मां बनने के लिए इंतजार करना पडता है।
हालांकि, इस स्थिति में महिलाओं को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि एक उम्र के बाद प्रेगनेंट होने की संभावना बहुत कम रह जाएगी।
51 की उम्र के बाद शरीर में हार्मोंस में गिरावट आती है इसलिए इस उम्र से पहले कंसीव कर लेना चाहिए।
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मां बनने के लिए संतुलित वजन होना बहुत जरूरी है। प्रेगनेंट होने के लिए आपका बॉडी मास इंडेक्स 19 और 24 के बीच होना चाहिए। ओवरवेट या अंडरवेट का असर ओवुलेशन पर पड सकता है।
अगर आप मां बनना चाहती हैं तो इसके लिए आपको धूम्रपान करना बंद करना होगा। इससे एग की सप्लाई डैमेज हो सकती है और प्रेगनेंट होने पर मिसकैरेज हो सकता है।
डायट का ख्याल रखें और कैफीन एवं शराब से दूर रहें क्योंकि ये प्रेगनेंसी में तो दिक्कतें आती हैं और भ्रूण के विकास में भी रुकावटें पैदा हो सकती हैं।
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